क्या पलट सकता है वक्फ बिल का फैसला? जानें वो 11 ऐतिहासिक फैसले जिनमें संशोधनों को चुनौती दी गई

वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान की मूल संरचना और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए अहम हो सकता है। यह लेख सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के आधार पर इस विधेयक के संवैधानिक पहलुओं पर चर्चा करता है।

By Pankaj Singh
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क्या पलट सकता है वक्फ बिल का फैसला? जानें वो 11 ऐतिहासिक फैसले जिनमें संशोधनों को चुनौती दी गई
वक्फ बिल का फैसला

वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 के खिलाफ राजनीतिक हलचल और कानूनी विवाद ने देशभर में चर्चा का माहौल बना दिया है। इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों ने पारित किया, लेकिन इसके बाद प्रमुख राजनीतिक नेताओं, जैसे कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद और एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, यह सवाल उठाते हुए कि क्या यह विधेयक संविधान के मौलिक अधिकारों और संरचना का उल्लंघन करता है। उनका दावा है कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर आक्रमण करता है और संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है। अब सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस विधेयक को चुनौती देने वाली याचिकाओं को स्वीकार करेगा या इसे बरकरार रखेगा?

इतिहास में कई ऐसे महत्वपूर्ण फैसले रहे हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा पारित कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अहम निर्णय दिए हैं। यह वक्फ विधेयक भी उसी पैटर्न में फिट बैठता है। हम उन ऐतिहासिक मामलों की चर्चा करेंगे जिन्होंने इस प्रकार के विधेयकों के संवैधानिक पहलुओं पर महत्वपूर्ण विचार किए थे।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले

  1. ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950)
    यह सुप्रीम कोर्ट का पहला बड़ा फैसला था, जिसमें निवारक निरोध कानून की संवैधनिकता पर सवाल उठाया गया। कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा की और इसके कुछ प्रावधानों को बदलने की आवश्यकता पर बल दिया। यह फैसला संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।
  2. शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951)
    इस मामले में संविधान संशोधन की प्रक्रिया पर बहस हुई। सुप्रीम कोर्ट ने संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार दिया, लेकिन बाद में इस अधिकार की सीमाएं भी निर्धारित की गईं। इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि संसद संविधान के कुछ मूल सिद्धांतों को बदलने का अधिकार नहीं रखती है।
  3. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)
    इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों को समाप्त करने वाला कोई भी संशोधन नहीं कर सकती। यह मामला संविधान की मूल संरचना की नींव रखता है, जो वक्फ विधेयक के खिलाफ दायर याचिकाओं के लिए एक मजबूत आधार बन सकता है।
  4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
    इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘मूल संरचना सिद्धांत’ को स्थापित किया, जिसके तहत संसद को संविधान की मूल भावना को बदलने का अधिकार नहीं है। यह सिद्धांत वक्फ विधेयक के खिलाफ चुनौती के लिए प्रमुख हो सकता है।
  5. इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राजनारायण (1975)
    इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 39वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक करार दिया, क्योंकि यह संविधान की मूल संरचना के खिलाफ था। यह भी एक उदाहरण है कि कोर्ट कैसे संवैधानिक संशोधनों को पलट सकता है।
  6. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)
    इस मामले में कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 368 के खंड (4) को असंवैधानिक करार दिया, जो न्यायिक पुनर्विलोकन को सीमित करता था। यह फैसला वक्फ विधेयक जैसी संवैधानिक चुनौतियों के लिए प्रासंगिक हो सकता है।
  7. आईआर कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007)
    कोर्ट ने इस फैसले में तय किया कि संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कानून भी मूल संरचना के उल्लंघन के आधार पर चुनौती योग्य होते हैं। यह निर्णय वक्फ विधेयक को चुनौती देने के मामले में अहम हो सकता है।
  8. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (2019)
    सुप्रीम कोर्ट ने सीएए के खिलाफ याचिकाओं को खारिज कर दिया, लेकिन यह भी दिखाता है कि कोर्ट हर मामले में हस्तक्षेप करता है और संशोधनों की संवैधानिकता पर विचार करता है।
  9. धारा 370 का निरस्तीकरण (2019)
    इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाने के निर्णय को बरकरार रखा, जो सरकार के पक्ष में था, लेकिन यह साबित करता है कि कोर्ट बड़े संशोधनों की समीक्षा करता है।
  10. इलेक्टोरल बॉन्ड मामला (2024)
    सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक करार दिया, यह उदाहरण है कि कोर्ट संवैधानिक बदलावों की समीक्षा कर सकता है।
  11. आरटीआई संशोधन (2019)
    सूचना के अधिकार में किए गए संशोधन को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इसका फैसला लंबित है, लेकिन यह कोर्ट की भूमिका को स्पष्ट करता है।

वक्फ विधेयक और सुप्रीम कोर्ट

वक्फ विधेयक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह तय होगा कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने का कितना अधिकार है। इस मामले में ओवैसी और जावेद की याचिकाएं कोर्ट की शक्ति और संवैधानिक संरचना पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं। अब यह कोर्ट पर निर्भर है कि वह इस विधेयक को संविधान के अनुरूप पाता है या इसे असंवैधानिक करार देता है।

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Pankaj Singh

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